राजस्थान के प्रमुख दुर्ग

राजस्थान के प्रमुख दुर्ग

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राजस्थान के प्रमुख दुर्ग

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राजस्थान के प्रमुख दुर्ग

राजस्थान के प्रमुख दुर्ग निम्नलिखित है

राजस्थान के राजपूत शासकों के नगरों और निवास स्थलों का निर्माण पहाडि़यों में हुआ, क्योकि वहां शुत्रओं के विरूद्ध प्राकृतिक सुरक्षा के प्रयुक्त साधन होते थे।  यहां के राजा  शुक्र व सुरक्षा नीति के अनुसार अपने दुर्गों का निर्माण करवाते थे। शुक्र नीति में दुर्गो की नौ श्रेणियों का उल्लेख किया गया था।

दुर्गों के प्रकार :-

एरण दूर्ग :– खाई, कांटों तथा कठौर पत्थरों से घिरा जहां पहुंचना बेहद कठिन हो जैसे – रणथम्भौर का दुर्ग।

पारिख दूर्ग :– जिसके चारों ओर खाई होती थी जैसे -लोहगढ़/भरतपुर का दुर्ग।

पारिध दूर्ग :– ईट, पत्थरों से बना मजबूत परकोटा -युक्त जैसे -चित्तौड़गढ का दुर्ग

वन/ओरण दूर्ग :– चारों ओर वन से ढ़का हुआ दुर्ग जैसे- सिवाणा का दुर्ग।

जल/ओदक :– पानी से घिरा हुआ दुर्ग जैसे – गागरोन का दुर्ग।

गिरी दूर्ग :– एकांत में पहाड़ी पर स्थित तथा जल संचय प्रबंध हो जैसे- कुम्भलगढ़ का दुर्ग।

सैन्य दूर्ग :– जिसकी व्यूह रचना चतूर वीरों के मौजूद होने से हो यह दुर्ग अभेध्य माना जाता हैं।

सहाय दूर्ग :– सदा साथ देने वाले बंधुजन जिस दुर्ग हो।

चित्तौड़गढ़ दुर्ग:-

यह चित्रकुट पहाड़ी पर स्थित, राजस्थान का एक प्राचीनतम गिरी दुर्ग है।

इस दुर्ग को चित्रांगन मौर्य  ने 8 वीं सदी में निर्मित करवाया।

इस दुर्ग को राजस्थान राज्य का गौरव, राजस्थान के दक्षिण पूर्व का प्रवेशद्वार तथा दुर्गों का सिरमौर भी कहते  हैं।

इस किले के बारे में यह भी कहा जाता है कि “गढ तो चित्तौड़गढ बाकी सब गढैया है”।

चित्तौडग़ढ़ दुर्ग क्षेत्रफल की दृष्टि से राजस्थान का सबसे बड़ा दुर्ग है।

चित्तौड़गढ़ दुर्ग में देखने योग्य स्थल:+

विजय स्तम्भ:-

इसे मेवाड़ के राजा राणा कुम्भा ने मुगल शासक महमूद खिलजी के नेतृत्व वाली मालवा और गुजरात की सेनाओं पर जीत (1442 ई.) के स्मारक के रूप में भगवान विष्णु के नाम विजय स्तम्भ को बनवाया। इसे विष्णु स्तम्भ भी कहते है। यह विजय स्तम्भ 9 मंजिला तथा 120 फीट ऊंचा है। इस स्तम्भ के चारों ओर हिन्दू देवी-देवताओं की मूर्तियां स्थापित है। विजय स्तम्भ को भारतीय इतिहास में मूर्तिकला का विश्वकोष अथवा अजायबघर भी कहा जाता हैं। विजय स्तम्भ का शिल्पकार जैता, नापा, पौमा और पूंजा को माना गया है।

जैन कीर्ति स्तम्भ:-

चित्तौडगढ़ दुर्ग में स्थित जैन कीर्ति स्तम्भ को अनुमानित भगेरवाल जैन जीजा कथोड द्वारा 11 वीं या 12 वी शताब्दी में बनवाया गया। यह 75 फुट ऊंचा और 7 मंजिला स्तम्भ है।

कुम्भ श्याम मंदिर, मीरा मंदिर, पदमनी महल,फतेह प्रकाश संग्रहालय तथा कुम्भा के महल (वर्तमान में जीर्ण -शीर्ण अवस्था आदि प्रमुख दार्शनिक स्थल स्थित है।

साके:-

प्रथम साका :- सन् 1303 ईसवी में मेवाड़ के महाराणा रावल रतनसिंह चित्तौड़ का पहला साका हुआ। चित्तौडगढ़ को जीतने  वाला आक्रान्ता अल्लाउद्दीन खिलजी था। उसने दुर्ग का नाम बदलकर खिज्राबाद कर दिया था। चित्तौडगढ़ के प्रथम साके/ युद्ध का आंखों देखी अलाउद्दीन का दरबारी कवि और लेखक अमीर ने अपनी कृति तारीख -ए-अलाई में वर्णित किया है।

द्वितीय साका :- 1534 ई. में मेवाड़ के महाराणा विक्रमादित्य के समय शासक बहादुर शाह ने किया था। युद्ध के उपरान्त महाराणी कर्णावती ने जौहर किया था।

तृतीय साका:- सन् 1567 ईसवी में मेवाड़ के महाराणा उदयसिंह  पर मुगल सम्राट अकबर ने आक्रमण किया था। चित्तौडगढ़ का तृतीय साका राणा जयमल राठौड़ और पता सिसोदिया के पराक्रम और बलिदान के लिए विश्व प्रसिद्ध है।

चित्तौड़गढ के प्रथम साके में रतन सिंह के साथ सेनानायक गोरा व बादल (रिश्ते मे पदमिनी के भाई थे) वीरगति को प्राप्त हुए।

अजयमेरू दुर्ग(तारागढ़):-

बीठली पहाड़ी पर स्थित होने के कारण इस दुर्ग को गढ़बीठली के नाम से भी जाना जाता है।

यह गिरी श्रेणी का प्रसिद्ध दुर्ग है। यह दुर्ग पानी के झालरों के लिए विश्व प्रसिद्ध है

इस दुर्ग को अजमेर नगर के संस्थापक चैहान नरेश अजयराज ने निर्मित करवाया था।

मेवाड़ के राणा रायमल के छोटे युवराज (राणा सांगा के भाई) पृथ्वी राज (उड़ाणा पृथ्वी राज) ने अपनी तीरांगना पत्नी तारा वती के नाम पर इस दुर्ग का नाम तारागढ़ रखा था।

रूठी रानी (राव मालदेव की पत्नी) आजीवन इसी दुर्ग में निवासित थी।

तारागढ़ दुर्ग की अभेद्यता के कारण विशप हैबर ने इसे “राजस्थान का जिब्राल्टर ” अथवा “पूर्व का दूसरा जिब्राल्टर” भी कहा है।

इतिहासकार हरबिलास शारदा ने “अखबार-उल-अखयार” को उद्घृत करते हुए लेखन किया है, कि तारागढ़ कदाचित भारत का पहला गिरी दुर्ग है।

तारागढ़ के अंदर प्रसिद्ध मुस्लिम संत मीरान साहेंब (मीर सैयद हुसैन) की दरगाह यहां स्थित है।

रूठी रानी का असली नाम उम्रादे भटियाणी जी था।

तारागढ दुर्ग(बूंदी):-

इस दुर्ग को देवसिंह हाड़ा/बरसिंह हाड़ा ने निर्मित करवाया।

तारे जैसी आकृति होने के के कारण इस दुर्ग का नाम तारागढ़ पड़ा।

यह दुर्ग “गर्भ गुंजन तोप” के लिए विश्व प्रसिद्ध है।

भीम बुर्ज और रानी जी की बावड़ी (राव अनिरूद्ध सिंह) द्वारा इसी दुर्ग मे मौजूद हैं

रंग विलास (चित्रशाला) इस दुर्ग में निर्मित हैं।

रंग विलास चित्रशाला को उम्मेद सिंह हाड़ा ने निर्मित किया।

इतिहासकार किप्ल्रिन के हिसाब से इस किले को  भूत-प्रेत व आत्माओं द्वारा निर्मित किया गया। तारागढ दुर्ग (बूंदी) भित्ति चित्रण की दृष्टि से समृद्ध माना जाता है।

रणथम्भौर दुर्ग (सवाई माधोपुर):-

सवाई माधोपुर जिले में स्थित यह दुर्ग अरावली की पहाड़ियों घिरा हुआ एरण श्रेणी का दुर्ग है।

दूर से देखने पर यह दुर्ग दिखाई ही नहीं देता है।

यह दुर्ग जगत/जयंत द्वारा बनवाया गया दुर्ग है।

अबुल फजल ने इस दुर्ग के लिए लेखन किया है कि ” अन्य नंगे है जबकि यह दुर्ग बख्तरबंद है।”

दर्शनिय स्थल:-

1.रनिहाड़ तालाब 2. जोगी महल 3. सुपारी 4.जोरां-भोरां/जवरां- भवरां के महल 5. त्रिनेत्र गणेश 6. 32 कम्भों की छत्तरी 7. रानी महल 8.हम्मीर महल प्रमुख दर्शनीय स्थल है

मेहरानगढ़ दुर्ग(जोधपुर):-

राठौड़ों के शौर्य के साक्षी मेहरानगढ़ दुर्ग की नींव मई, 1459 में रखी गई थी।

मेहरानगढ़ दुर्ग चिडि़या-टूक पहाडी पर निर्मित है।

मोर जैसी आकृति के कारण यह किला म्यूरघ्वजगढ़ भी कहलाता है।

दर्शनिय स्थल:-

1- माता चामुंडा मंदिर –यह मंदिर महाराजा राव जोधा ने बनवाया।

1857 की क्रांति के समय इस मंदिर के क्षतिग्रस्त व जीर्ण हो जाने के कारण इसका पुनर्निर्माण महाराजा राव तखतसिंह न करवाया।

2- चेखॆ लाव महल- राव जोधा द्वारा बनवाया महल है।

3- फूल महल –राव अभयसिंह राठौड़ द्वारा बनवाया महल है।

4- फतह महल –इसका निर्माण अजीत सिंह राठौड ने करवाया।

5- मोती महल –इसका निर्माण  सूरसिंह राठौड़ ने करवाया है।

6- भूरे खां की मजार

7- महाराजा मानसिंह पुस्तक प्रकाश (पुस्तकालय)

दौलतखाने के आंगन में महाराजा तखतसिंह द्वारा विनिर्मित एक शिंगगार चैकी (श्रृंगार चैकी) है जहां जोधपुर के राजाओं का राजतिलक हुआ करता था।

दुर्ग के लिए बेहद प्रसिद्ध पंक्ति – ” जबरों गढ़ जोधाणा रो”

ब्रिटिश इतिहासकार किप्लिन ने इस दुर्ग के लिए विशेष रूप से कहा है कि – इस दुर्ग का निर्माण देवताओ,फरिश्तों, तथा परियों के माध्यम से हुआ है।

दुर्ग में स्थित प्रमुख व प्रसिद्ध तोपें- 1.किलकिला 2.शम्भू बाण 3. गजनी खां 4. चामुण्डा 5. भवानी

सोनारगढ़ दुर्ग(जैसलमेर):-

इस दुर्ग को उत्तर भड़ किवाड़ भी कहा जाता है।

यह दुर्ग धान्व व गिरी श्रेणी का प्रसिद्ध दुर्ग है।

यह दुर्ग त्रिकुट पहाड़ी/ गोहरान पहाड़ी पर निर्मित है।

दुर्ग के अन्य नाम – गोहरानगढ़ , जैसाणागढ़ है।

इस दुर्ग की स्थापना राव जैसल भाटी के द्वारा 1155 ई. में हुआ।

इस दुर्ग के निर्माण में चूने का प्रयोग नहीं हुआ है।

पीले पत्थरों से बने होने के कारण स्वर्णगिरि कहलाती है।

इस किले में 99 बुर्ज स्थित है।

यह दुर्ग राजस्थान में चित्तौड़गढ के बाद सबसे बडा फोर्ट है।

जैसलमेर दुर्ग की सबसे प्रमुख विशेषता है कि इसमें ग्रन्थों का एक दुर्लभ भण्डार है जिसे जिनभद्र कहते है। सन् 2005 में इस दुर्ग को वर्ल्ड हैरिटेज सूची में सम्मिलित किया गया।

आॅस्कर विजेता ” सत्यजीतरे” द्वारा इस दुर्ग को फिल्म हेतु फिल्माई गई।

जैसलमेर में ढाई साके होना लोकविश्रुत है।

1- पहला साका – दिल्ली के सुल्तान अलाउद्दीन खिलज्जी व भाटी शासक मूलराज के बीच भीषण युद्ध हुआ।

2- द्वितीय साका – फिरोज शाह तुगलक के आक्रमण से रावल दूदा व त्रिलोक सिंह  वीरगति को प्राप्त की।

3- तीसरा साका – जैसलमेर का तीसरा साका जैसलमेर का अर्द्ध साका राव लूणसर में 1550 ईसवी में हुआ।

आक्रमण करने वाला कन्द शासक अमीर अली था।

मैग्जीन दुर्ग(अजमेर):-

यह दुर्ग स्थल श्रेणी का प्रसिद्ध दुर्ग है।

मुगल सम्राट अकबर द्वारा बनवाया गया है।

इस दुर्ग को ” अकबर का दौलतखाना” के रूप में भी जाना जाता है।

यह दुर्ग पूर्णतः मुस्लिम स्थापत्य कला पर आधारित है।

सर टाॅमस ने सन् 1616 ईसवी में जहांगीर को अपना परिचय इसी दुर्ग में दिया किया।

आमेर दुर्ग-आमेर (जयपुर):-

यह गिरी श्रेणी का दुर्ग एक मुख्य दुर्ग है।

इसका निर्माण 1150 ईसवी में दुल्हराय कच्छवाह ने करवाया था।

प्रमुख मंदिर :- शीला माता का मंदिर, सुहाग मंदिर, जगत सिरोमणि मंदिर स्थित है।

प्रमुख महल :- शीश महल, दीवान-ए-खाश, दीवान-ए-आम स्थित है।

दीवान-ए-आम को मिर्जा राजा जय सिंह द्वारा निर्मित किया गया।

जयगढ दुर्ग(जयपुर):-

यह दुर्ग चिल्ह का टिला नामक पहाड़ी पर स्थित है।

इस दुर्ग का निर्माण मिर्जा राजा जययसिंह जी ने करवाया था। लेकिन यहां महलों का निर्माण सवाई जयसिंह ने करवाया।

इस दुर्ग में तोप ढ़ालने का कारखाना भी मौजूद है।

सवाई जयसिंह के द्वारा निर्मित जयबाण तोप पहाडि़यों पर खडी सबसे बड़ी तोप मानी जाती है।

आपातकाल के दौरान पूर्व प्रधानमंत्री श्री मति इन्द्रागांधी जी ने खजाने की प्राप्ति के लिए इस किले की खुदाई करवाई गई थी।

विजयगढ़ी भवन (अंत दुर्ग) कच्छवाह शासकों की आन बान और शान है।

नहारगढ दुर्ग(जयपुर):-

इस दुर्ग का निर्माण 1734 ईसवी में राजा सवाई जयसिंह नें किया।

किले के भीतर विद्यमान सुदर्शन कृष्ण मंदिर दुर्ग का प्राचीन नाम सूदर्शनगढ़ है।

नाहरसिंह भोमिया के नाम पर इस दुर्ग का नहारगढ़ दुर्ग रखा गया।

राव माधों सिंह – द्वितीय ने अपनी नौ पत्नियों के लिए एक किले का निर्माण नाहरगढ़ दुर्ग में करवाया था। इस दुर्ग के पास जैविक उद्यान भी मौजूद है।

गागरोण दुर्ग(झालावाड़):-

इस दुर्ग का निर्माण परमार वंश की डोड शाखा के प्रमुख शासक बीजलदेव ने करवाया था।

डोडा राजपूतों के अधिकार के कारण यह दुर्ग डोडगढ/ धूलरगढ़ नामों से भी जाना जाता है।

“चैहान कुल कल्पद्रुम” के हिसाब से खींची राजवंश का संस्थापक देवन सिंह उर्फ धारू न अपने बहनोई बीजलदेव डोड की हत्या करके धूलरगढ़ पर अधिकार कर लिया तथा उसका नाम गागरोण दुर्ग रखा।

यह दुर्ग बिना किसी नीव के मुकंदरा पहाड़ी की सीधी चट्टानों पर खड़ा एक अनूठा दुर्ग है।

गागरोण दुर्ग कालीसिंध व आहु नदियों के संगम पर स्थित जल श्रेणी का दुर्ग है।

विद्वानों के अनुसार इसे पृथ्वीराज ने अपना प्रसिद्व ग्रन्थ “वेलिक्रिसन रूकमणीरी” गागरोण में रहकर लिखा था।

अकबर ने गागरोण दुर्ग बीकानेर के राजा कल्याणमल पुत्र पृथ्वीराज को जागीर के रूप में दे दिया जो एक भक्त कवि और वीर योद्धा था।

दर्शनीय स्थल:

1.संत पीपा की छत्तरी 2. मिट्ठे साहब को दरगाह 3.जालिम कोट परकोटा 4. गीध कराई स्थित है।

साके:-

– प्रथम  साका – सन् 1423 ईसवी में अचलदास खींची (भोज का पुत्र) तथा मांडू के सुलतान अलपंखा गौरी (होंशगशाह) के बीच भीष्ण युद्ध हुआ। विजय के पश्चात दुर्ग का भार शहजादे जगनी खां को सौपा गया। गागरोज के पहले साके का विवरण शिवदास गाढण द्वारा लिखि गई पुस्तक ‘ अचलदास खींची री वचनिका’ में मिलता है।

– दूसरा साका – सन् 1444 ईसवी में वाल्हणसी खीची व महमूद खिलजी के बीच भीषण युद्ध हुआ। पाल्हणसी खींची को भीलो ने मार दिया (जब वह दुग् में पलायन कर रहा था) कुम्भा द्वारा भेजे गए धीरा (घीरजदेव) ने नेतृत्व में केसरिया हुआ और ललनाओं ने जौहर प्रदर्शित किया। महमूद खिलजी ने जीत के उपरांत दुर्ग का नाम बदल कर मुस्तफाबाद दुर्ग रखा।

कुम्भलगढ़ दुर्ग(राजसमंद):-

अरावली की तेरह चोटियों से घिरा हुआ है, जरगा पहाडी पर (1148 मी.) ऊंचाई पर निर्मित गिरी श्रेणी का प्रसिद्ध दुर्ग है।

इस दुर्ग का निर्माण महाराणा कुम्भा ने विक्रम संवत्1505 ईसवी में अपनी पत्नी कुम्भलदेवी की याद में बनवाया।

इस दुर्ग का निर्माण कुम्भा के प्रमुख शिल्पी मण्डन की  देखरेख में हुआ था।

इस दुर्ग को मेवाड़ की आंख भी कहा जाता है।

इस दुर्ग की ऊंचाई के बारे में अतृल फजल ने लिखा है कि ” यह इतनी बुलन्दी पर बना हुआ है कि नीचे से देखने पर सिर से पगड़ी नीचे गिर जाती है।”

कर्नल टाॅड ने इस दुर्ग की तुलना “एस्टुकन”से  भी की है।

इस दुर्ग के चारों और 36 किलोमीटर लम्बी दीवार बनी हुई है। दीवार की चैड़ाई इतनी ज्यादा है कि चार घुडसवार एक साथ बराबर अन्दर जा सकते है। इस लिए इसे ‘भारत की सबसे बड़ी दीवार’ भी कहा जाता है।

कुम्भलगढ दुर्ग के अंदर एक छोटा दुर्ग भी स्थित है, जिसे कटारगढ़ कहा जाता है, जो महाराणा कुम्भा का निवास स्थान भी रहा है।

दुर्ग के अन्य नाम – कुम्भलमेर कुम्भलमेरू,कुंभपुर मच्छेद और माहोर अन्य नाम है।

इस दुर्ग में ‘झाली रानी का मालिका’ भी मौजूद है।

बयाना दुर्ग (भरतपुर):-

यह दुर्ग गिरी श्रेणी का प्रसिद्ध दुर्ग है।

इस दुर्ग का निर्माण राजा विजयपाल सिंह यादव न करवाया।

अन्य नाम-शोणितपुर, बाणपुर, श्रीपुर एवं श्रीपथ मुख्य है।

अपनी दुर्भेद्यता के कारण बादशाह दुर्ग व विजय मंदिर गढ भी कहा जाता है।

अन्य दर्शनिय स्थल:-

भीमलाट- विष्णुवर्घन द्वारा लाल पत्थर से बनवाया गया स्तम्भ है

विजयस्तम्भ- समुद्र गुप्त द्वारा बनवाया गया स्तम्भ है।

ऊषा मंदिर

लोदी मीनार स्थित है

सिवाणा दुर्ग(बाड़मेर):-

यह दुर्ग गिरी तथा वन दोनों श्रेणी का प्रसिद्ध दुर्ग है।

कुमट झाड़ी की अधिकता होने के कारण इसे कुमट दुर्ग भी कहा जाता है।

इस दुर्ग का निर्माण राजा श्री वीरनारायण पवांर ने छप्पन की पहाडि़यों में करवाया था।

इस दुर्ग में दो साके हुए है।

पहला साका – सन् 1308 ईसवी में शीतलदेव चैहान के समय आक्रमणकारी अलाउद्दीन खिलजी के आक्रमण के कारण सांका हुआ।

दूसरा साका – वीर कल्ला राठौड़ के समय अकबर से मिला हुआ मोटा राजा उदयसिंह के आक्रमण के कारण साका हुआ। यह साका सन 1565 ईसवी में हुआ।

जालौर दुर्ग(जालौर):-

परमार शासकों द्वारा सुकडी नदी के किनारे अस्तित्व में हैं।

यह दुर्ग गिरी श्रेणी का प्रसिद्ध दुर्ग है।

यह दुर्ग सोन पहाडी पर मौजूद दुर्ग है।

साका

सन् 1311 ईसवी में  राजा कान्हड देव चैहान के समय अलाउद्दीन खिलजी ने आक्रमण किया। इस आक्रमण में कान्हडदेव चैहान व उसका पुत्र वीरदेव दोनों वीरगति को प्राप्त हुुए तथा वीरांगनाओं ने जौहर कर लिया। इस साके की सम्पूर्ण जानकारी पद्मनाभ द्वारा रचित कान्हडदेव में मिलती है। संत मल्किशाह की दरगाह इस दुर्ग के प्रमुख दर्शनीय थी।

मंडरायल दुर्ग(सवाई माधोपुर):-

इस दुर्ग को ” ग्वालियर दुर्ग की कुंजी” भी कहते है। मंडरायल दुर्ग मर्दान शाह की दरगाह के लिए राज्य में प्रसिद्ध है।

भैंसरोड़गढ दुर्ग(चित्तौड़गढ):-

बामणी व चम्बल नदियों के संगम पर मौजूद होने के कारण यह दुर्ग जल श्रेणी का एक मुख्य दुर्ग है।

भैंसरोडगढ़ दुर्ग को “राजस्थान का वेल्लोर” भी कहा जाता है।

इस दुर्ग का निर्माण करता भैसाशाह व रोडावारण को माना जाता है।

मांडलगढ़ दुर्ग(भीलवाडा):-

इस दुर्ग को महाराणा कुम्भा ने निर्मित करवाया।

यह दुर्ग जल श्रेणी का एक प्रसिद्ध दुर्ग है।

मांडलगढ़ दुर्ग बनास, बेडच व मेनाल नदियों के संगम पर मौजूद है।

यह दुर्ग सिद्ध योगियों का प्रसिद्ध केन्द्र भी रहा है।

भटनेर दुर्ग(हनुमानगढ़):-

इस दुर्ग को सन् 285 ईसवी में भाटी राजा भूपत ने निर्मित करवाया।

घग्धर नदी के मुहाने पर बसे इस, प्राचीन दुर्ग को ” उत्तरी सीमा का प्रहरी” भी कहते है।

भटनेर दुर्ग धान्वन श्रेणी का प्रसिद्ध किला है।

इस दुर्ग पर इतिहास सर्वाधिक आक्रमण हुए। विदेशी आक्रमणकारियों में मुख्य-
1- महमूद गजनवी न विक्रम संवत् 1058 (1001 ईसवी) में भटनेर पर कब्जा कर लिया था।
2- 13 वीं सदी के बीच में गुलाम वंश के सुल्तान बलवन के शासनकाल में उसका चचेरा भाई शेर खां यहां का हाकिम हुआ करता था।
3- 1398 ईसवी में भटनेर को प्रसिद्ध डाकू तैमूरलंग के अधिन विभीविका झेलनी पड़ी।
बीकानेर के चतुर्थ शासक राव जैतसिंह ने 1527 ईसवी में आक्रमण कर भटनेर पर पहली बार राठौडों का अधिकार स्थापित किया। उसने राव कांधल के पोत्र खेतसी को दुर्गाध्यक्ष घोषित किया।

हुमायूं के भाई कामरान ने भटनेर क्षेत्र पर आक्रमण किया।सन् 1805 ई ईसवी में महाराजा सूरतसिंह के द्वारा मंगलवार को जाब्ता खां भट्टी से भटनेर दुर्ग अपने अधीन कर लिया। उस समय भटनेर का नाम हनुमानगढ़ रखा गया।

तैमूर लंग ने इस दुर्ग के लिए कहा है कि ” उसने इतना  सुरक्षित किला पूरे हिन्तुस्तान में कहीं नही देखा।” तैमूरलग की आत्मकथा ” तुजुक-ए-तैमूरी “के नाम से प्रसिद्ध है।

इस दुर्ग में शेर खां की मनार भी स्थित है।

भरतपुर दुर्ग(भरतपुर):-

इस दुर्ग को सन् 1733 ईसवी में राजा सूरजमल ने निर्मित करवाया था।

मिट्टी से बना यह दुर्ग अपनी अजेयता के लिए राज्य में प्रसिद्ध है।

किले के चारों ओर सुजान गंगा नहर भी बनाई गई जिसमे पानी भर दिया जाता था यह सुरक्षा की दृष्टि से महत्वपूर्ण था।

यह दुर्ग पारिख श्रेणी का एक मुख्य दुर्ग है।

मोती महल, जवाहर बुर्ज व फतेह बुर्ज (अंग्रेजों पर विजय की प्रतीक है।) स्थित है।

सन् 1805 ईसवी में अंग्रेज सेनापति लार्ड लेक ने इस दुर्ग को बारूद से उडाना चाहा लेकिन वह पूर्णत असफल रहा।

इस दुर्ग में लगा अष्टधातू का दरवाजा महाराजा जवाहर सिंह 1765 ईसवी में ऐतिहासिक लाल किले से उतार कर लाए थे।

चुरू का किला (चुरू):-

धान्व श्रेणी के इस प्रसिद्ध दुर्ग का निर्माण ठाकुर कुशाल सिंह ने करवाया था।

महाराजा शिवसिंह के समय बारूद खत्म होने पर यहां से चांदी के गोले दागे गए थे।

जूनागढ़ दुर्ग (बीकानेर):-

यह दुर्ग धान्व श्रेणी का एक मुख्य दुर्ग हैं।

लाल पत्थरों से निर्मित इस भव्य किले का निर्माण बीकानेर के प्रतापी शासक रायसिंह जी ने करवाया।

इस दुर्ग को अधगढ़ भी कहा जाता हैं।

इस दुर्ग में जैइता मुनि द्वारा रचित रायसिंह ,प्रशस्ति मोजूद है।

सूरजपोल की एक मुख्य बात यह है कि इसके दोनों तरफ 1567 ईसवी के चित्तौड़ के साके में वीरगति पाने वाले दो इतिहास प्रसिद्ध वीरों जयमल मेडतियां और उनके बहनोई आमेर के रावत पता सिसोदिया की गजारूढ मूर्तियां स्थापित की गई है।

दर्शनिय स्थल:-

हेरम्भ गणपति मंदिर

अनूपसिंह महल

सरदार निवास महल स्थित है।

नागौर दुर्ग(नागौर):-

नागौर दुर्ग के उपनाम नागदुर्ग, नागाणा व अहिच्छत्रपुर के नाम से प्रसिद्ध है।

इस दुर्ग का निर्माण चैहान वंश के शासक सोमेश्वर के द्वारा किया गया।

अमर सिंह राठौड़ की वीर गाथाएं इस दुर्ग से जुडी हुई है।

नागौर दुर्ग को एक्सीलेंस अवार्ड भी मिला है।

अचलगढ़ दुर्ग(सिरोही):-

परमार वंश के शासकों द्वारा 900 ईसवी के आसपास निर्मित किया गया माना जाता है।

इस दुर्ग को आबु का किला भी कहा जाता हैं।

दर्शनीय स्थल

अचलेश्वर महादेव मंदिर- शिवजी के पैर का अंगूठा प्रतीक के रूप में मौजूद है।

भंवराथल – गुजरात का मुगल शासक महमूद बेगडा जब अचलेश्वर के नदी व अन्य देव प्रतिमाओं को खण्डित कर लौट रहा था तब मक्खियों न आक्रमणकारियों पर हमला कर दिया। इस घटना की स्मृति में वह स्थान आज भी भंवराथल के नाम से विश्व प्रसिद्ध है।

मंदाकिनी कुण्ड – आबू पर्वतांचल में स्थित अनेक देव मंदिरों के कारण आबू पर्वत को हिन्दू ओलम्पस  (देव पर्वत) भी कहलाता है।

शेरगढ़ दुर्ग(धौलपुर):-

इस दुर्ग का निर्माण कुशाण वंश के शासन काल में हुआ था।

शेरशाह सूरी ने इस दुर्ग का पुनर्निर्माण करवाकर इसका नाम शेरगढ़ दुर्ग रखा था।

यह दुर्ग “दक्खिन का द्वार गढ” नाम से भी प्रसिद्ध है।

महाराजा कीरतसिंह द्वारा बनाया गया “हुनहुंकार तोप” इसी दुर्ग में मौजूद है।

शेरगढ़ दुर्ग(बांरा):-

हाडौती क्षेत्र का यह दुर्ग कोशवर्धन दुर्ग के नाम से भी सम्पूर्ण विश्व भर में प्रसिद्ध है।

यह दुर्ग परवन नदी के तट पर मौजूद है।

चैमू का किला (जयपुर):-

इस किले का निर्माण जयपुर ठाकुर कर्णसिंह ने करवाया था। उपनाम- चैमूहांगढ़, धाराधारगढ़ तथा रधुनाथगढ के नाम से जाना जाता है।

कांकणबाडी का किला (अलवर):-

इस किले में मुगल शासक औरंगजेब ने अपने भाई दाराशिकोह को कैद करके रखा था।

राजस्थान के अन्य दुर्ग:-

कोटडा का किला – बाडमेर में स्थित है।

खण्डार दुर्ग-सवाई माधोपुर में स्थित है।  इस दुर्ग में तोप स्थित है।

माधोराजपुरा का किला – जयपुर में स्थित है।

कंकोड/कनकपुरा का किला – टोंक में स्थित है।

शाहबाद दुर्ग – बांरा में स्थित है। नवलवान तोप इस दुर्ग में स्थित है।

बनेडा दुर्ग – भीलवाडा में स्थित है।

बाला दुर्ग – अलवर में स्थित है।

बसंतगढ़ किला – सिरोही में स्थित है।

तिमनगढ़ किला – करौली में स्थित है।

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राजस्थान के प्रमुख दुर्ग

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1 / 10

राजस्थान में "बाला दुर्ग" किस जिले में स्थित हैं ?

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मीठेशाह की दरगाह स्थित है

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निम्न में से कौनसा दुर्ग’हिन्दू देवी-देवताओं का अजायबघर’ कहलाता है?

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भूपत भाटी द्वारा निर्मित भटनेर दुर्ग स्थित है

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चित्तौडगढ़ दुर्ग में स्थित नौखण्डा विजय स्तम्भ का निर्माण 1438 ई. में किस शासक ने सुल्तान महमूद शाह खिलजी को परास्त करने के उपलक्ष्य में करवाया?

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कुम्भलगढ़ दुर्ग कितनी लम्बी दीवार से घिरा है

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धरती से आकाश के तारे के समान दिखाई देने वाला दुर्ग है?

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गागरोण का दुर्ग किन नदियों के संगम पर स्थित है?

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सोनारगढ़ किस श्रेणी का दुर्ग है

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राजस्थान का वह एक महान दुर्ग जिसकी प्राचीर 36 किमी तक फैली हुई है?

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